पुणे,१२ जून 2026: नोबल हॉस्पिटल ॲन्ड रिसर्च सेंटर के डॉक्टरों की टीम ने सायटस इनव्हर्सस टोटॅलिसया जैसी दुर्लभ जन्मजात स्थिति से पीड़ित 44 वर्षीय महिला पर लॅप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी यह कम से कम छेदवाली प्रक्रिया सफलतापूर्वक की.
सायटस इनव्हर्सस टोटॅलिस एक जन्मजात स्थिति है, जिसमें छाती और पेट की रिक्त जगह के अवयव सामान्य स्थिति के विपरीत या प्रतिबिंबित रूप में स्थित होते हैं. यह स्थिति लगभग 10,000 से 25,000 जन्मों में से केवल एक व्यक्ति में पाई जाती है. सरल शब्दों में कहें तो छाती और पेट के प्रमुख अंग शरीर रचना में उल्टी दिशा में स्थित होते हैं,यानी यह शरीर की सामान्य रचना का प्रतिबिंब है. उदाहरण के लिए, हृदय का निचला सिरा (एपेक्स) बाईं ओर होने के बजाय दाईं ओर होता है तथा यकृत बाईं ओर स्थित होता है. इस स्थिति में सामान्यतः कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन शरीर की प्रतिबिंबित संरचना के कारण किसी भी सर्जरी या निदान प्रक्रिया में तकनीकी कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं. इस महिला को सिम्प्टोमॅटिक कोलेलिथियासिस की समस्या थी, जिसका सामान्य उपचार लॅप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी द्वारा किया जाता है. लेकिन अवयव की प्रतिबिंब स्थिती के कारण पारंपरिक सर्जिकल तकनीक, ट्रोकर उपकरणों की स्थिति तथा सर्जन की एर्गोनॉमिक्स में विशेष बदलाव करना आवश्यक था.
इस संबंध में जानकारी देते हुए नोबल हॉस्पिटल ॲन्ड रिसर्च सेंटर के वरिष्ठ रोबोटिक व लॅप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. अभिजीत व्होटकर ने बताया कि जब महिला हमारे पास आईं थी, तब वे पिछले चार दिनों से तीव्र पेट दर्द से पीड़ित थीं. उन्हें पिछले एक वर्ष से उच्च रक्तचाप था तथा पिछले 15 वर्षों से पूर्व में हुए हर्निया ऑपरेशन के स्थान पर सूजन हुई थी.इससे पहले उनकी ट्यूबल लिगेशन सर्जरी भी हो चुकी थी. इसके अतिरिक्त उन्होंने फेफड़ों को प्रभावित करने वाले ट्युबरक्युलॉसिस का उपचार भी लिया था. साथ ही, उनके शरीर की अँटी रेट्रो व्हायरल थेरेपी के प्रति प्रतिसाद भी अच्छा नहीं थी. इन सभी वैद्यकीय स्थितियों के कारण यह सर्जरी अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी.
पेट दर्द के कारण का पता लगाने के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी और एमआरसीपी जांच की गई.जांच में कोलेलिथियासिस विथ सायटस इनव्हर्सस टोटॅलिस का निदान हुआ. इसके बाद हर्निया के उपचार के लिए मेयो रिपेयर तकनीक और साथ ही लॅप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी द्वारा पित्ताशय निकालने की योजना बनाई गई. हालांकि, मरीज की सेरोपॉझिटिव्हीटी स्थिति के कारण संसर्ग नियंत्रण, रोगप्रतिकारक स्थिति का मूल्यांकन तथा सर्जिकल टीम की सुरक्षा से संबंधित विशेष सावधानियां अत्यंत महत्वपूर्ण थीं.
इसके बाद कीहोल सर्जरी के माध्यम से पित्ताशय को सफलतापूर्वक निकाल दिया गया. रक्तस्राव को नियंत्रित किया गया तथा सर्जरी के बाद अतिरिक्त द्रव का निचरा करने के लिए पेट में अस्थायी ट्यूब लगाई गई. अंत में छोटे छेद को बंद किया गया और हर्निया के कारण उत्पन्न सूजन को भी ठीक किया गया
उपचार करनेवाले डॉक्टरों की टीम में डॉ.अभिजीत व्होटकर के साथ भूलतज्ञ डॉ.प्रतिक कदम,शल्यचिकित्सक डॉ.राजश्री सहा,डॉ.कविश पंडित इनका समावेश था.
इस दौरान टीम को बधाई देते हुए नोबल हॉस्पिटल ॲन्ड रिसर्च सेंटर के उपव्यवस्थापकीय संचालक डॉ. दिविज माने ने कहा कि, अन्य जटिलताओं के साथ ऐसे दुर्लभ बीमारी का उपचार करने के लिए अत्यंत सूक्ष्म योजना और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है.अस्पताल की कुशल डॉक्टर, कर्मचारी टीम तथा अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ ऐसे मुश्किल हालात में,ऐसी तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण प्रक्रियाओं को सुरक्षित रूप से करने में मदद की.


