पुणे : बाप रे! आज बोपोड़ी के पठानचाल के सामने एक दिल छू लेने वाला नज़ारा देखने को मिला। बीजेपी की कॉर्नर मीटिंग चल रही थी। मंच पर एक-एक कर वक्ता अपनी राय रख रहे थे, चुनावी रणनीति पर बात हो रही थी, जिम्मेदारियां बताई जा रही थीं। माहौल पूरी तरह सियासी था।
इसी दौरान जैसे ही ईशा की नमाज़ का वक्त हुआ और अजान की आवाज़ गूंजने लगी, मंच पर भाषण दे रहे बीजेपी उम्मीदवार परशुराम वाडेकर ने तुरंत अपना भाषण रोक दिया। न कोई हड़बड़ी, न कोई असहजता। पूरी अजान खत्म होने के बाद ही उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई।
यह कोई छोटी बात नहीं है। यह एक साफ संदेश है कि आस्था का सम्मान राजनीति से बड़ा हो सकता है। अजान के दौरान भाषण रोकना, दरअसल इंसानियत को प्राथमिकता देना है। इसके लिए उनका शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए।
आज के समय में, जब महाराष्ट्र में कुछ सांप्रदायिक ताकतें अजान के खिलाफ खड़ी होने की कोशिश कर चुकी हैं, मस्जिदों के भोंगों को हटाने की पुरज़ोर मुहिम चलाई गई, तब यही अजान बिना किसी जोर-जबरदस्ती के, बिना किसी नारेबाज़ी के, एक सियासी माइक को खुद-ब-खुद खामोश कर देती है। यह अजान की ताकत है शांत, लेकिन असरदार।
यहां दो स्तरों पर सकारात्मकता दिखती है। एक तरफ एक राजनीतिक व्यक्ति द्वारा अजान का एहतराम, और दूसरी तरफ अजान का वह नैतिक प्रभाव, जो राजनीति को भी पल भर के लिए रोक देता है। न कोई टकराव, न कोई बयानबाज़ी बस खामोशी और सम्मान।
शायद यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती है। जहां अलग-अलग विचार, अलग-अलग आस्थाएं, एक-दूसरे के लिए जगह बनाती हैं। आज बोपोड़ी में जो हुआ, वह सिर्फ एक घटना नहीं थी वह एक संदेश था।
कि अजान सिर्फ एक आवाज़ नहीं, एक एहतराम है।
और जब एहतराम जिंदा हो, तो समाज भी जिंदा रहता है।
इस तरह इन्सानियत का अजब नजारा देखने को मिला l


