“पार्टी व्हिप प्रणाली के कारण संसदीय स्वायत्तता पर महत्वपूर्ण सीमाएँ लगती हैं, जबकि वीटो जैसी व्यवस्था के अभाव में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर और अधिक प्रतिबंध लगते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विधायी प्रक्रियाओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा संकुचित हो जाता है,” ऐसा प्रो. (डॉ.) विलास आढाव ने कहा। वे पुणे कॉलेज, पुणे में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में “सतत लोकतंत्र पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचार” विषय पर अर्थशास्त्र विभाग (स्नातकोत्तर एवं अनुसंधान केंद्र) तथा आजीवन शिक्षण एवं विस्तार विभाग, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
आगे उन्होंने उल्लेख किया कि डॉ. आंबेडकर ने 1952 के अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान “Survival of Democracy” में सतत लोकतंत्र के मानदंडों को स्पष्ट किया था। उन्होंने लोकतंत्र को केवल एक शासन प्रणाली न मानकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित जीवन-पद्धति बताया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि राजनीतिक लोकतंत्र की नींव सामाजिक लोकतंत्र में होनी चाहिए, जिसे संवैधानिक नैतिकता के माध्यम से बनाए रखा जाए तथा व्यक्तिपूजा, सामाजिक-आर्थिक असमानता और जवाबदेही के अभाव जैसी चुनौतियों से सुरक्षित रखा जाए। उन्होंने आगे कहा कि नैतिक नेतृत्व, जागरूक एवं सजग नागरिक और एक मजबूत विपक्ष के बल पर ही लोकतंत्र फलता-फूलता है; इसके लिए संवैधानिक मूल्यों के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता और सक्रिय जनभागीदारी आवश्यक है।
अध्यक्षीय भाषण में प्राचार्य डॉ. इकबाल एन. शेख ने अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और संचालित करने के संवैधानिक अधिकारों को रेखांकित किया तथा समावेशी और न्यायपूर्ण शैक्षणिक वातावरण विकसित करते हुए संवैधानिक संरक्षणों को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विद्यार्थियों से संविधान का सम्मान करने और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में योगदान देने का आह्वान किया।
एक अन्य संसाधन व्यक्ति, डॉ. मुख्तार शेख ने भारतीय संविधान की रूपरेखा में निहित सतत लोकतंत्र के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को आधारभूत माना तथा विश्व इतिहास के उदाहरणों के माध्यम से समाज निर्माण में इन मूल्यों की भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता, मौलिक अधिकार, संस्थागत जवाबदेही और सक्रिय नागरिक भागीदारी को सुदृढ़ लोकतंत्र के लिए अनिवार्य तत्व बताया।
इस अवसर पर पूना कॉलेज के नॉलेज रिसोर्स सेंटर द्वारा Dr. Babasaheb Ambedkar के जीवन और कार्य पर आधारित पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शनी में सामाजिक न्याय, समानता तथा भारतीय संविधान के निर्माण में उनके योगदान को दर्शाने वाली समृद्ध पुस्तकें, लेखन और दुर्लभ दस्तावेज प्रदर्शित किए गए। पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद जुबेर ने इस पुस्तक प्रदर्शनी का समन्वयन किया।
डॉ. शिरीन शेख ने स्वागत भाषण दिया और डॉ. आंबेडकर की चिरस्थायी विरासत को स्मरण करने के महत्व को रेखांकित किया, जबकि कार्यक्रम समन्वयक डॉ. एम. शाहिद जमाल अंसारी ने कार्यक्रम के उद्देश्यों को स्पष्ट किया। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. अहमद शमशाद के पठण से हुई और अंत में डॉ. अंसारी ने आभार प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में प्रो. विद्यासागर सिंगाराम, डॉ. नरगिस वानी, डॉ. बाबासाहेब शेख, डॉ. शाकिर शेख सहित प्राध्यापकों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही, जिससे यह कार्यक्रम अर्थपूर्ण और बौद्धिक रूप से समृद्ध बना।


